रुद्रपुर स्थित दुग्धेश्वरनाथ मंदिर’ में स्थापित शिवलिंग की अपनी अनूठी विशेषता
कमलाकर मिश्न की रिपोर्ट
देवरिया से बीस किलोमीटर दूर छोटी काशी के रूप में प्रसिद्ध रूद्रपुर का दुग्धेश्वर नाथ मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर नेपाल और बिहार राज्य के शिवभक्त यहां दर्शन पूजन के लिये आते है। दुग्धेश्वर नाथ मंदिर वैसे तो इस मंदिर पर वर्ष भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शिवरात्रि, श्रावण मास और अधिक मास में यहां उत्तर प्रदेश के भक्तों के साथ-साथ पड़ोसी राष्ट्र नेपाल और बिहार राज्य के भी भक्त यहां बाबा का दर्शन पूजन करने के लिए आते हैं। शिवरात्रि के अवसर पर यहां एक माह का मेला भी लगता है। जहां बाहर के व्यापारी अपनी-अपनी दुकानों को सजाते हैं।11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध है। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है उसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग पाताल गामी हैं। यहां भक्त शिवलिंग के पूजा करने के लिए आज भी 14 सीढ़ियां नीचे उतरकर जाते हैं। ग्यारहवीं सदी में इस मंदिर के वर्तमान स्वरुप का निमार्ण रूद्रपुर सतासी राज के राजा हरी सिंह ने करवाया था। यहां के शिवलिंग को महाकालेश्वर उज्जैन की भांति इसे पौराणिक महत्ता मिली हुई है। यह उनका उपलिंग है। त्रयंबकेश्वर भगवान के बाद रूद्रपुर में बाबा भोले नाथ का लिंग धरातल से करीब 15 फीट नीचे हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। कई इतिहासकारों ने उस लिपि को पढ़ने की चेष्टा की, लेकिन सफल नहीं हो पाए।