गुरु की कृपा के बिना भगवान् की प्राप्ति असंभव है। जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है- महामंडलेश्वर
कृपाशंकर यादव
गाजीपुर । गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु की कृपा के बिना भगवान् की प्राप्ति असंभव है। जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती हैं, वे परम गुरु हैं। गुरु की भूमिका भारत में केवल आध्यात्म या धार्मिकता तक ही सीमित नहीं रही है, देश पर राजनीतिक विपदा आने पर गुरु ने देश को उचित सलाह देकर विपदा से उबारा भी है। अर्थात अनादिकाल से गुरु ने शिष्य का हर क्षेत्र में व्यापक एवं समग्रता से मार्गदर्शन किया है। अतः सद्गुरु की ऐसी महिमा के कारण उसका व्यक्तित्व माता-पिता से भी ऊपर है। उपरोक्त बातें महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनंदन यति जी महाराज ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सिद्धपीठ हथियाराम मठ पर उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा। कार्यक्रम के प्रारंभ में श्री यति जी महाराज ने वैदिक रीति रिवाज से अपने ब्रह्मलीन गुरु व जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी बालकृष्ण यति जी महाराज के चित्र पर माल्यार्पण व आरती कर पूजन अर्चन किया। इसके साथ ही उन्होंने सिद्धपीठ के ब्रह्मलीन 25 पीठाधीपतियों के साथ ही सभी संत महात्मा गुरुजनों का पूजन अर्चन कर नमन किया। गुरु महिमा का बखान करते हुए उन्होंने कहाकि गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक के अनुसार- 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरु' अर्थात जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग व नेपाल स्थित पशुपतिनाथ सहित 20 से अधिक धार्मिक तीर्थस्थलों पर 300 से अधिक वैदिक विद्वानों के साथ चतुर्मासअनुष्ठान संपादित किए जा चुके हैं। लेकिन पिछले 6 वर्षों से सिद्पीठ हथियाराम मठ पर बुढ़िया माई के सानिध्य में किए जाने वाले चातुर्मास अनुष्ठान से एक अलौकिक शान्ति प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि जब तीन उत्तम शिक्षक, एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा। बच्चा जन्म लेने के बाद जब बोलना सीखता है तब वह सबसे पहले जो शब्द बोलता है वो शब्द होता है "मां"। एक मां ही बच्चे को बोलना, खाना-पीना, चलना-फिरना आदि सिखाती है इसलिए एक मां ही हर मनुष्य की प्रथम गुरु होती है। माता से ही बच्चा संस्कार ग्रहण करता है। माता के उच्चारण व उसकी भाषा से ही वह भाषा-ज्ञान प्राप्त करता है। यही भाषा-ज्ञान उसके संपूर्ण जीवन का आधार होता है। श्री यति महाराज ने कहा कि सिद्धपीठ स्थित बुढ़िया माई के कृपा से ही इस पीठ का उत्तरोत्तर वृद्धि विकास संभव हुआ है। बुढ़िया माई की कृपा से लकवा जैसे असाध्य रोग से ग्रसित लोग भी अपने पैरों पर चलकर जाते हैं यह चमत्कार इस सिद्धपीठ की बुढ़िया माई के आशीर्वाद से ही संभव हो पाता है। शिष्यों को घर से ही गुरु पूजा किए जाने का निर्देश दिए जाने के बावजूद दोनों सिद्धपीठ पर उपस्थित हुए । श्रद्धालु गाजीपुर स्थानीय सिद्धपीठ हथियाराम मठ व सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ पर गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु पूजा के लिए शिष्य श्रद्धालुओं के बीच कोरोना प्रोटोकॉल का असर विशेष रूप से देखने को मिला। गौरतलब हो कि लगभग 700 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ हथियाराम मठ सिद्धसंतों की असली तपस्थली के रूप में विख्यात है। इसके साथ ही सतनामी संत परंपरा के संवाहक के रुप में 450 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ पर भी समाधिस्थ संतों की दर्शन पूजन के लिए प्रत्येक वर्ष से श्रद्धालुओं की देश के कोने-कोने से भीड़ उमड़ती रही है। लेकिन पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी कोविड कोरोना के चलते सिद्धपीठों द्वारा शिष्य श्रद्धालुओं को अपने घर से ही गुरु पूजा का संदेश दिया गया था। इसके बावजूद काफी बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हुए। जिनके लिए सिद्धपीठों द्वारा बैरिकेडिंग व कोरोना प्रोटोकाल के तहत पूरी व्यवस्था की गई थी। जिसका पालन करते लोग नजर आए। कार्यक्रम में ब्रह्मचारी सन्त डॉ रत्नाकर त्रिपाठी, आचार्य संजय पांडेय, आचार्य, सुरेश जी त्रिपाठी, सन्त देवरहा बाबा, वरुण देव सिंह, जितेंद्र सिंह वैभव, अमिता दुबे, राजेन्द्र सिंह, अमित सिंह, रमाशंकर राजभर, सन्त देवरहा बाबा, राजेश यादव, संतोष यादव, रमेश यादव सहित काफी संख्या में लोग रहे।