गरीबों के मसीहा मदर टेरेसा के रास्ता पर चलने का लिया संकल्प-शिक्षिका सोनिया
दुर्गा दत्त मिश्र की रिपोर्ट
राजकीय कन्या इंटर कॉलेज खलीलाबाद संतकबीरनगर उत्तर प्रदेश की व्यायाम शिक्षिका सोनिया ने बच्चो को मदर टेरेसा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हम सबको मानवता की राह पर चलकर मानवता के प्रति योगदान देकर उनका जन्मदिन मनाया जाता है। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 मेसेडोनिया देश के एक अलबेनियाई परिवार में हुआ था। मदर टेरेसा एक कैथोलिक नन थी। 18 साल तक अल्बेनिया में रहने के बाद व आयरलैंड चली गई। फिर 1929 में भारत में आकर अपना पूरा जीवन बेसहारा, असहाय गरीब लोगों के सेवा भाव में गुजारा। मदर टेरेसा का परिवार एक अच्छी आर्थिक स्थिति वाला था। मदर टेरेसा का असली नाम एग्नेश था। उन्होंने अपना नाम त्याग कर टेरेसा नाम चुना। मदर टेरेसा ने 18 साल की उम्र में ही घर छोड़ दिया था और सिर्फ घर ही नहीं देश भी छोड़ दिया था। मदर टेरेसा को भगवान का संदेश मिला की इस देश में सबसे गरीब , असहाय, मजलूम,लोगों की मदद करने हैं तो उन्होंने नर्सिंग कोर्स किया इसके बाद लोगों की मदद में जुट गई। मदर टेरेसा जब से सेवा के क्षेत्र में आए तो उन्होंने सबसे पहले अपनी ड्रेस को बदलकर साड़ी कर ली ताकि लोगों के बीच में आसानी से रह पाए। उन्होंने सबसे पहले आसान जीवन जीने की आदत डाली। ओर उन्हे झोपड़ी में रहना पड़ा और भीख मांग कर उन्होंने लोगों को पेट भरा कोढ़,फ्लेग,आदि जैसी बीमारियों के मरीजों की मदद की। मदर टेरेसा ने 1948 में भारत की नागरिकता ली और 17 अक्टूबर सन 1979 मैं उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया और सन 1980 में भारत का सबसे सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। मदर टेरेसा के द्वारा किए गए कार्य आज भी लोगों के लिए एक मिसाल है। मदर टेरेसा वास्तव में मानवता ,प्रेम ,और शांति की दूत थी। उनका विश्वास था कि दुनिया में सारी बुराइयां व्यक्ति से ही पैदा होती है। अगर व्यक्ति में प्रेम भरा होगा तो घर में प्रेम होगा और तभी समाज में प्रेम एवं शांति का वातावरण होगा ओर तभी विश्व शांति का सपना साकार होगा ।उनका संदेश था कि हमें एक दूसरे से इस तरह से प्रेम करना चाहिए जैसे ईश्वर हम सब से करता है तभी हम विश्व में, अपने देश में ,अपने घर में, अपने हृदय में ,शांति बना सकते हैं। उनके जीवन और दर्शन के प्रकाश में हमें अपने आपको परखना होगा और अपने कर्तव्यों को समझना होगा। तभी हम उस महामानव की जयंती मनाने की सच्ची पात्रता हासिल करेंगे। सोनिया ने कहा कि उनके पद चिन्हों पर चलकर मानव सेवा का संकल्प लेती हूं कि मानव सेवा ही सबसे अच्छी सेवा है। इस दुनिया में मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं।