ओलम्पिक और अपना देश
कमलाकर मिश्र की रिपोर्ट
भाग मिल्खा भाग ,,,, ये शब्द खिलाड़ियों को सकून देने और प्रेरित करने वाला शब्द था । परन्तु आज कहा भागे किसके पास भागे ये दर्द अब देश के खिलाड़ियों के लिए नासूर बन चुका है । हमारे रहनुमा तब जगते है , जब देश के खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक पाते है या पदक के करीब पहुचते है । ऐसा लगता है जैसे ये रहनुमा लोग कई वर्षों से इन खिलाड़ियों को मैदान में प्रैक्टिस करा रहे थे । आप ओलम्पिक में बहुत अच्छा खेले , देश को आप पर गर्व है आदि आदि,,,,। स्कूल , कालेजो से खेल कूद खत्म , देश के स्टेडियम मनोरंजन के स्थल बन चुके हैं । स्टेडियम में मौजूद खेल सामग्री बेकार हो चले है । स्टेडियम से खेल कोच नदारद है । खेल कमिसन चरम पर , खेल मंचो से खिलाड़ियों के लिए बड़ी बड़ी बाते और रिजल्ट शून्य । आज जो भी ओलम्पिक में पदक खिलाड़ी पा रहे हैं वे अपने दम पर पदक पा रहे हैं । कितना अच्छा डाइड यानी खिलाड़ियों को पोषक तत्व मिलता है जिससे हमारे खिलाड़ी विदेशी खिलाड़ियों को पछाड़ सके , उनमे मुकाबला करने की शक्ति हो , अरे आकाओ इन खिलाड़ियों के अधिकार पर साँप बन फन काढ़ डसने और गटकने लिए बैठे हो । जितने खिलाड़ी ओलम्पिक में गए हैं जरा उन सभी खिलाड़ियों के रहन सहन और घरों को आँख हो तो आँख फाड़ जरा देखो रहनुमाओ तुम्हे पता चल जाएगा कि वे किसके दम पर ओलम्पिक तक पहुचे है । हम सभी देशवासियों को गर्व है इन ओलम्पिक पदक विजेताओं पर । अब समय आ गया है कि हम जगे और अपने रहनुमाओ को जगाए । बहुत खेल खेला गया कागजो में अब आँखे खोलो और अपनी झोली का मुंह खिलाड़ियो के लिए ईमानदारी से खोल दो । फिर देखो हमारे देश के खिलाड़ी गोल्ड मेडल का देश पर बौछार कर देंगे । बस ईमानदारी से इन खिलाड़ियों पर खर्च करना होगा , राजनीतिक दखलंदाजी बन्द करनी होगी और खिलाड़ियों के हाथों खेल को सौपना होगा। अगर वक्त रहते ऐसा नही होगा,,,,,,,,तो खिलाड़ी रोयेंगे और खेल आका ,,,,,,,,,? ' खाओ कमिसन रहो मगन , खड़ा करो अपने अपने महल ' । " देश के लिए गोल्ड मेडल लाने वाले नीरज चोपड़ा को बधाई " ।